बच्चों को मोबाइल मत दीजिए: 10 खतरनाक कारण

भूमिका: जब घर में शांति नहीं, सिर्फ़ स्क्रीन की गुलामी बची है

Spend More Time with Children Dont Give them Mobile

मित्रों, आज भारत के लगभग हर घर की एक तस्वीर एक जैसी हो गई है।
कमरे में माँ बैठी है, हाथ में मोबाइल।
पास में पिता हैं, उनकी भी आँखें स्क्रीन में गड़ी हैं।
और बीच में बच्चा… छोटा सा बच्चा… जिसकी उँगलियाँ मोबाइल पर इतनी तेज़ चल रही हैं कि लगता है जैसे वह जन्म से यही अभ्यास लेकर आया हो।

लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि बच्चा मोबाइल चला रहा है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है —
👉 क्या हम अनजाने में अपने ही बच्चे का भविष्य छीन रहे हैं?

आज माता-पिता अक्सर कहते हैं:
“मोबाइल दे दो, बच्चा परेशान नहीं करता।”
“मोबाइल दे दो, खाना आराम से खा लेता है।”
“मोबाइल दे दो, चुपचाप बैठा रहता है।”

पर मित्रों, क्या आपने कभी यह सोचा है कि
बच्चे की यह चुप्पी स्वाभाविक नहीं है?
यह शांति नहीं है…
यह धीरे-धीरे बन रही मानसिक गुलामी है।

मोबाइल बना आधुनिक लोरी — पर परिणाम बेहद खतरनाक

पहले माँ बच्चे को सुलाने के लिए लोरी गाती थी।
उस लोरी में भाव होते थे, संस्कार होते थे, अपनापन होता था।
आज लोरी की जगह मोबाइल ने ले ली है।

अब बच्चा सोता नहीं है —
स्क्रीन देखते-देखते बेहोश होता है।

और यह फर्क समझना बहुत ज़रूरी है।
नींद प्राकृतिक प्रक्रिया है।
बेहोशी मानसिक थकावट का संकेत है।

जब बच्चा मोबाइल देखते-देखते सोता है, तो उसका मस्तिष्क शांत नहीं होता —
उसका मस्तिष्क थक कर बंद हो जाता है।
यही कारण है कि ऐसे बच्चे सुबह उठकर भी ताज़ा महसूस नहीं करते।

धीरे-धीरे उनका स्वभाव बदलता है,
उनकी ऊर्जा घटती है,
उनकी जिज्ञासा मरने लगती है।

माता-पिता की भूल, बच्चों की कीमत

मित्रों, कड़वा सच यह है कि
आज बच्चों की इस स्थिति के लिए सबसे अधिक ज़िम्मेदार हम स्वयं हैं।

हम बच्चे को समय नहीं देते।
हम बच्चे से संवाद नहीं करते।
हम बच्चे की जिज्ञासाओं को सुनते नहीं।
और फिर विकल्प के रूप में उसके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं।

मोबाइल बच्चे को व्यस्त तो रखता है,
लेकिन वह व्यस्तता विकास नहीं, विनाश की ओर ले जाती है।

यही कारण है कि आज
बच्चे कम बोलते हैं,
कम सोचते हैं,
कम समझते हैं,
और ज़्यादा scroll करते हैं।

यह केवल आदत नहीं, यह भविष्य की दिशा है

बहुत से माता-पिता सोचते हैं —
“अभी छोटा है, बड़ा हो जाएगा तो छोड़ देगा।”

यह सबसे बड़ी भ्रांति है।

बचपन में बनी आदतें
जीवन भर पीछा करती हैं।

अगर बच्चा 5–6 साल की उम्र में
दिन में 3–4 घंटे मोबाइल देखने का आदी हो गया,
तो किशोर अवस्था में वह
6–8 घंटे से कम पर रुकेगा ही नहीं।

और फिर जब माता-पिता चाहेंगे कि बच्चा पढ़ाई पर ध्यान दे,
तो बच्चा कहेगा:
“मन नहीं लगता।”
“बोरियत होती है।”
“पढ़ने का दिल नहीं करता।”

दरअसल उसका मन पढ़ाई से नहीं हटा —
हमने ही उसे मोबाइल की आदत देकर
पढ़ाई से दूर कर दिया।

आज का संकट, कल की राष्ट्रीय समस्या

यह विषय केवल घर का विषय नहीं है मित्रों।
यह पूरे राष्ट्र का विषय है।

जब एक पीढ़ी कमजोर सोच वाली होगी,
कमजोर एकाग्रता वाली होगी,
कमजोर आत्मसंयम वाली होगी —
तो देश का भविष्य भी कमजोर होगा।

राष्ट्र मजबूत तब बनता है
जब उसके बच्चे मानसिक रूप से मजबूत हों,
संस्कारों से जुड़े हों,
अनुशासन में पले हों,
और जीवन को समझने वाले हों।

मोबाइल से जुड़ा बच्चा
जीवन से कटता चला जाता है।

आत्ममंथन का प्रश्न

इस पहले section का अंत मैं एक प्रश्न से करता हूँ,
और यही प्रश्न पूरे ब्लॉग की आत्मा है:

👉 क्या आप अपने बच्चे को
सिर्फ़ आज शांत रखना चाहते हैं,
या उसे कल का मजबूत नागरिक बनाना चाहते हैं?

क्योंकि दोनों रास्ते अलग-अलग हैं।
और दोनों के परिणाम भी अलग-अलग हैं।

मोबाइल बच्चों के मस्तिष्क, मन और शरीर को कैसे अंदर से तोड़ता है

मित्रों, अगर समस्या केवल आदत की होती, तो शायद इतना खतरा नहीं था।
लेकिन वास्तविकता यह है कि
👉 मोबाइल बच्चों के मस्तिष्क की संरचना,
👉 बच्चों की भावनात्मक क्षमता,
👉 और बच्चों के शारीरिक विकास
तीनों को अंदर से प्रभावित कर रहा है।

और यह कोई भावनात्मक डर नहीं है,
यह आज के समय की वास्तविकता है।

1. बच्चों का मस्तिष्क: जो बन रहा है, वही बिगड़ भी सकता है

बचपन का मस्तिष्क अभी निर्माण की अवस्था में होता है।
हर अनुभव, हर दृश्य, हर ध्वनि —
उसके भीतर neural pathways बनाती है।

जब बच्चा कहानियाँ सुनता है,
तो कल्पना शक्ति विकसित होती है।
जब बच्चा खेलता है,
तो समस्या सुलझाने की क्षमता बढ़ती है।
जब बच्चा सवाल करता है,
तो तार्किक सोच जन्म लेती है।

लेकिन जब बच्चा मोबाइल देखता है —
तो मस्तिष्क केवल reaction mode में चला जाता है।
Scroll करो, tap करो, video बदलो, reel बदलो।

सोचना नहीं…
समझना नहीं…
केवल प्रतिक्रिया देना।

धीरे-धीरे बच्चा
गहराई से सोचने की क्षमता खो देता है।
और जो बच्चा गहराई से सोच नहीं पाता,
वह जीवन में गहराई से निर्णय भी नहीं ले पाता।

2. Dopamine का जाल – आनंद नहीं, लत

मित्रों, मोबाइल का सबसे खतरनाक प्रभाव है —
👉 Dopamine trap

जब बच्चा video देखता है, game जीतता है, reel scroll करता है —
तो उसके मस्तिष्क में dopamine नाम का chemical निकलता है,
जो instant pleasure देता है।

शुरुआत में यह आनंद लगता है।
लेकिन धीरे-धीरे मस्तिष्क उस pleasure का आदी हो जाता है।
फिर बिना मोबाइल के
बच्चा खुश महसूस ही नहीं कर पाता।

यही कारण है कि:

  • मोबाइल छीनो → बच्चा चिड़चिड़ा

  • मोबाइल बंद → बच्चा उदास

  • मोबाइल नहीं मिला → गुस्सा, रोना, चिल्लाना

यह bad behavior नहीं…
यह addiction का लक्षण है।

और याद रखिए,
लत चाहे किसी भी चीज़ की हो —
वह जीवन को अंदर से कमजोर करती ही है।

3. भावनात्मक बुद्धि का पतन

पहले बच्चे
माँ का चेहरा देखकर भाव समझते थे।
पिता की आवाज़ से सुरक्षा महसूस करते थे।
दोस्त की आँखों में दर्द देखकर सहानुभूति सीखते थे।

आज बच्चा
emoji से भावना समझता है,
screen से रिश्ता बनाता है,
और virtual दुनिया में जीने लगता है।

पर screen भावना नहीं सिखा सकती।
Screen करुणा नहीं सिखा सकती।
Screen रिश्ते निभाना नहीं सिखा सकती।

यही कारण है कि आज के बहुत से बच्चे:

  • दूसरों की भावनाएँ नहीं समझते

  • जल्दी irritate हो जाते हैं

  • relationship संभाल नहीं पाते

  • भीतर से confused रहते हैं

बुद्धि तेज़ हो सकती है,
लेकिन भावनात्मक रूप से बच्चा कमजोर होता चला जाता है।

4. शरीर भी भुगत रहा है मोबाइल का परिणाम

यह केवल मानसिक विषय नहीं है मित्रों।
यह शारीरिक संकट भी बन चुका है।

आज के बच्चों में बढ़ रही हैं:

  • गर्दन दर्द

  • आँखों की कमजोरी

  • सिर दर्द

  • मोटापा

  • शारीरिक जड़ता

  • खेल से दूरी

पहले बच्चा दौड़ता था,
पेड़ पर चढ़ता था,
मिट्टी में गिरता था,
फिर उठता था।

आज बच्चा
एक ही posture में घंटों बैठा रहता है।
उसकी रीढ़, उसकी मांसपेशियाँ, उसकी ऊर्जा —
सब धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं।

कमजोर शरीर + कमजोर मन
कभी भी मजबूत भविष्य नहीं बना सकता।

5. सबसे खतरनाक असर — इच्छाशक्ति का क्षय

जीवन में आगे बढ़ने के लिए
सबसे जरूरी शक्ति होती है —
👉 इच्छाशक्ति (Will Power)।

लेकिन मोबाइल बच्चे को सिखा रहा है:

  • “जो अच्छा न लगे, skip कर दो”

  • “जो कठिन हो, छोड़ दो”

  • “जो तुरंत आनंद न दे, ignore कर दो”

यही सोच आगे चलकर
बच्चे को संघर्ष से डराने लगती है।

ऐसा बच्चा:

  • मेहनत से भागेगा

  • धैर्य नहीं रख पाएगा

  • कठिन रास्ते से डर जाएगा

  • और जीवन की हर परीक्षा में कमजोर पड़ जाएगा

मोबाइल की लत के संकेत: कैसे पहचानें कि बच्चा धीरे-धीरे टूट रहा है

मित्रों, सबसे खतरनाक बात यह है कि
मोबाइल की लत अचानक नहीं दिखती।
यह धीरे-धीरे आती है…
चुपचाप घर में प्रवेश करती है…
और तब तक पकड़ मजबूत कर लेती है,
जब तक माता-पिता जागते हैं, बहुत देर हो चुकी होती है।

इसलिए ज़रूरी है कि हम समय रहते संकेत पहचानें।

1. मोबाइल छिनते ही गुस्सा – यह normal नहीं है

अगर आपके बच्चे के हाथ से मोबाइल लेते ही:

  • वह चिल्लाने लगता है

  • रोने लगता है

  • चीज़ें फेंकने लगता है

  • ज़िद्दी हो जाता है

  • आपसे बहस करने लगता है

तो समझिए —
यह केवल आदत नहीं,
यह dependency है।

स्वस्थ मन वाला बच्चा
मोबाइल के बिना भी शांत रह सकता है।
लेकिन addicted बच्चा
मोबाइल के बिना खुद को असहाय महसूस करता है।

यह पहला और सबसे बड़ा alarm है।

2. हर समय बोरियत की शिकायत

आज बहुत से माता-पिता कहते हैं:
“मेरा बच्चा हर समय कहता है – बोर हो रहा हूँ।”

मित्रों, यह वाक्य बहुत गहरा है।

बोरियत का मतलब है —
बच्चे का मन अब साधारण चीज़ों में आनंद नहीं ले पा रहा।

किताब? बोरिंग।
खेल? बोरिंग।
बातें? बोरिंग।
पर मोबाइल? Interesting।

क्यों?
क्योंकि मस्तिष्क अब केवल high stimulation का आदी हो चुका है।
और यही स्थिति आगे चलकर जीवन से आनंद छीन लेती है।

3. अकेले रहना पसंद करना

पहले बच्चा परिवार के बीच रहना चाहता था।
माँ के पास बैठता था।
पिता से सवाल पूछता था।
भाई-बहन के साथ खेलता था।

अब स्थिति बदल जाती है:

  • बच्चा कमरे में अकेले बैठना पसंद करता है

  • दरवाज़ा बंद रखता है

  • बातचीत कम कर देता है

  • परिवार की गतिविधियों से कटने लगता है

मित्रों, यह केवल privacy नहीं है।
यह धीरे-धीरे बन रही emotional दूरी है।

और भावनात्मक दूरी
एक दिन रिश्तों को कमजोर कर देती है।

4. पढ़ाई से अचानक अरुचि

बहुत से माता-पिता कहते हैं:
“पहले तो बच्चा अच्छा पढ़ता था, अब मन ही नहीं लगता।”

यह बदलाव अचानक नहीं आता।
इसके पीछे अक्सर एक कारण होता है —
मोबाइल से मिलने वाला आसान आनंद।

पढ़ाई में प्रयास लगता है।
मोबाइल में effort नहीं लगता।
इसलिए मस्तिष्क naturally आसान रास्ते को चुनने लगता है।

धीरे-धीरे बच्चा:

  • Homework टालने लगता है

  • पढ़ाई से बचने लगता है

  • परीक्षा से डरने लगता है

  • ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता

और माता-पिता सोचते हैं कि
बच्चा आलसी हो गया है।
असल में बच्चा overstimulated हो चुका होता है।

5. नींद का बिगड़ना – सबसे खामोश खतरा

यदि आपका बच्चा:

  • रात को देर तक जागता है

  • सुबह उठने में परेशानी होती है

  • दिन में थका हुआ रहता है

  • बार-बार जम्हाई लेता है

  • स्कूल जाने में उत्साह नहीं दिखाता

तो कारण अक्सर रात का screen time होता है।

मोबाइल की तेज़ रोशनी
मस्तिष्क के natural sleep cycle को बिगाड़ देती है।

और जब नींद खराब होती है,
तो सोच, स्मरण, ध्यान, व्यवहार —
सब कुछ प्रभावित होने लगता है।

6. कल्पनाशक्ति का समाप्त होना

एक बहुत subtle लेकिन गंभीर संकेत यह है:

बच्चा अब कुछ नया नहीं सोचता।
वह अपनी कहानी नहीं बनाता।
नए खेल invent नहीं करता।
कुछ create नहीं करता।

वह केवल वही दोहराता है
जो उसने screen पर देखा है।

मित्रों, creativity का मरना
बुद्धि के विकास का रुक जाना है।

और जो बच्चा सोच नहीं पाता,
वह भविष्य में innovation नहीं कर पाता।

7. माता-पिता की बातों को ignore करना

पहले जब आप बोलते थे,
बच्चा सुनता था।

अब आप बोलते हैं,
और बच्चा:

  • “हम्म…” करता है

  • जवाब नहीं देता

  • मोबाइल में डूबा रहता है

  • आँख मिलाकर बात नहीं करता

यह सिर्फ़ bad manners नहीं है।
यह attention disconnect है।

धीरे-धीरे माता-पिता की आवाज़
बच्चे के लिए background noise बन जाती है।

और जब माता-पिता की आवाज़ का प्रभाव खत्म हो जाता है,
तो फिर बाहरी दुनिया बच्चे को दिशा देने लगती है।

आत्मचिंतन का क्षण

इस section का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं है।
इसका उद्देश्य जागरूकता पैदा करना है।

अगर आप इन संकेतों में से
कुछ भी अपने बच्चे में देख रहे हैं,
तो यह guilt का विषय नहीं है।
यह जागने का अवसर है।

क्योंकि जब तक स्थिति reversible है,
तब तक सुधार संभव है।

लेकिन इसके लिए
पहले स्वीकार करना होगा
कि समस्या मौजूद है।

समाधान: बच्चों को मोबाइल से कैसे बचाएँ और उन्हें मजबूत, संस्कारवान, आत्मनिर्भर कैसे बनाएँ

मित्रों, अब तक हमने समस्या को गहराई से समझा।
अब प्रश्न यह है —
👉 क्या समाधान संभव है?
👉 क्या बच्चा मोबाइल की पकड़ से बाहर आ सकता है?

उत्तर है — हाँ, बिल्कुल आ सकता है।
लेकिन इसके लिए माता-पिता को पहले खुद बदलना होगा।

क्योंकि याद रखिए:
👉 बच्चा वही करता है, जो वह देखता है।

1. परिवर्तन की शुरुआत माता-पिता से होती है

अगर आप चाहते हैं कि बच्चा मोबाइल कम देखे,
तो सबसे पहले आपको अपने हाथ से मोबाइल नीचे रखना होगा।

बहुत बार दृश्य ऐसा होता है:

  • पिता मोबाइल चला रहे हैं

  • माँ मोबाइल में लगी हैं

  • और बच्चा भी मोबाइल माँग रहा है

फिर हम कहते हैं —
“बच्चा ज़्यादा मोबाइल देखता है।”

मित्रों, बच्चा उपदेश से नहीं, उदाहरण से सीखता है
अगर घर का वातावरण mobile-centric होगा,
तो बच्चा भी वही सीखेगा।

इसलिए पहला नियम:
👉 पहले स्वयं अनुशासन, फिर बच्चे से अपेक्षा।

2. स्पष्ट नियम बनाइए, लेकिन प्रेम के साथ

समाधान मोबाइल तोड़ देना नहीं है।
समाधान है सीमा निर्धारित करना।

कुछ व्यावहारिक नियम:

  • दिन में अधिकतम 30–45 मिनट स्क्रीन

  • भोजन के समय मोबाइल पूरी तरह बंद

  • सोने से कम से कम 2 घंटे पहले screen बंद

  • सुबह उठने के बाद पहला घंटा बिना मोबाइल

  • होमवर्क से पहले और दौरान mobile निषेध

लेकिन यह सब आदेश की तरह नहीं,
संवाद की तरह लागू होना चाहिए।

बच्चे को समझाइए:
“यह नियम तुम्हें सज़ा देने के लिए नहीं,
तुम्हें मजबूत बनाने के लिए है।”

जब बच्चा उद्देश्य समझता है,
तो वह विरोध नहीं करता — सहयोग करता है।

3. मोबाइल हटाइए नहीं, विकल्प दीजिए

यह सबसे बड़ी गलती होती है माता-पिता की।
वे मोबाइल छीन लेते हैं,
लेकिन बच्चे को कोई विकल्प नहीं देते।

फिर बच्चा बोर होता है, चिड़चिड़ा होता है,
और फिर वापस मोबाइल की माँग करता है।

इसलिए ज़रूरी है कि मोबाइल की जगह
बच्चे को जीवन के रंग दिए जाएँ:

  • Outdoor खेल

  • साइकिल

  • कहानी की किताबें

  • चित्र बनाना

  • संगीत

  • भजन

  • पहेलियाँ

  • परिवार के साथ बातचीत

  • छोटे-छोटे घरेलू काम

जब बच्चा जीवन से जुड़ता है,
तो screen अपने आप पीछे छूटने लगती है।

4. रोज़ कम से कम 30 मिनट Quality Time

मित्रों, यह सबसे powerful उपाय है।

हर दिन कम से कम 30 मिनट
बच्चे के साथ बिना मोबाइल के बैठिए।

उससे पूछिए:

  • आज स्कूल में क्या हुआ?

  • किससे बात की?

  • क्या अच्छा लगा?

  • क्या बुरा लगा?

  • क्या सोच रहे हो?

जब बच्चा महसूस करता है कि
माँ-बाप उसे सुनते हैं, समझते हैं,
तो उसे mobile में comfort ढूँढने की ज़रूरत नहीं रहती।

बच्चे का सबसे बड़ा emotional food है —
👉 माता-पिता का ध्यान।

5. संस्कार, कथा और भारतीय दृष्टि का समावेश

बच्चों को केवल rules नहीं चाहिए,
उन्हें जड़ें चाहिए।

उन्हें कहानियाँ सुनाइए:

  • रामायण की

  • महाभारत की

  • भक्त प्रह्लाद की

  • ध्रुव की

  • शिवाजी की

  • गुरु गोबिंद सिंह की

जब बच्चा अपने संस्कृति नायकों से जुड़ता है,
तो उसके भीतर अपने आप
चरित्र, धैर्य, साहस और उद्देश्य विकसित होता है।

मोबाइल बच्चे को content देता है,
संस्कार बच्चे को character देता है।

और चरित्र ही जीवन की असली पूँजी है।

6. मोबाइल को शत्रु नहीं, साधन बनाइए

एक संतुलित दृष्टिकोण यह भी है कि
मोबाइल को पूरी तरह दुश्मन न बनाइए,
बल्कि उसे सही दिशा में उपयोग करना सिखाइए।

जैसे:

  • Educational videos

  • Learning apps

  • Skill-based content

  • Creativity tools

  • Knowledge channels

बच्चे को सिखाइए कि
मोबाइल entertainment का खिलौना नहीं,
ज्ञान का साधन भी हो सकता है।

जब उद्देश्य बदलता है,
तो उपयोग की दिशा बदल जाती है।

अंतिम सत्य: बच्चे भविष्य नहीं, राष्ट्र की नींव हैं

मित्रों, यह विषय केवल parenting का नहीं है।
यह राष्ट्र निर्माण का विषय है।

आज हम जिस बच्चे को मोबाइल में खो देंगे,
कल वही बच्चा:

  • कमजोर सोच वाला नागरिक बनेगा

  • बिना धैर्य का युवा बनेगा

  • बिना दिशा का व्यक्ति बनेगा

लेकिन आज अगर हम उसे:

  • संस्कार देंगे

  • संवाद देंगे

  • अनुशासन देंगे

  • समय देंगे

  • स्नेह देंगे

तो वही बच्चा कल:

  • मजबूत नागरिक बनेगा

  • चरित्रवान युवा बनेगा

  • राष्ट्र को दिशा देने वाला व्यक्तित्व बनेगा

समापन – आत्मा से निकली अंतिम बात

मित्रों,
बच्चों को mobile देने से
घर शांत ज़रूर हो जाता है,
लेकिन भविष्य शोर से भर जाता है।

और बच्चों को समय देने से
शुरुआत में मेहनत लगती है,
लेकिन भविष्य आनंद से भर जाता है।

चुनाव आपके हाथ में है।

👉 Screen या संस्कार
👉 Convenience या Character
👉 आज की शांति या कल का गौरव

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