
भारत की नई भू-राजनीतिक चाल: रूस, चीन और अमेरिका के बीच संतुलन का बड़ा खेल
प्रस्तावना: दो मुलाकातें, लेकिन संकेत बहुत बड़े
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार शब्दों से ज्यादा तस्वीरें बोलती हैं।
एक तस्वीर में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात करते दिखाई देते हैं। दूसरी ओर, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के प्रमुख अधिकारियों में शामिल अजीत डोभाल चीन के वरिष्ठ राजनयिक वांग यी के साथ बातचीत करते दिखाई देते हैं।
ऊपरी तौर पर देखें तो ये सामान्य कूटनीतिक मुलाकातें लग सकती हैं। लेकिन इनके पीछे जिस समय और परिस्थितियों का संदर्भ है, वह इन्हें बेहद महत्वपूर्ण बना देता है।
एक तरफ रूस है, जिसके साथ भारत के लंबे समय से रणनीतिक संबंध हैं। दूसरी तरफ चीन है, जिसके साथ भारत के सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा दोनों मौजूद हैं। और तीसरी तरफ अमेरिका है, जो भारत का बड़ा व्यापारिक साझेदार होने के साथ-साथ रूस के साथ भारत के बढ़ते संबंधों को लेकर लगातार दबाव बनाता रहा है।
यही कारण है कि इन मुलाकातों को केवल शिष्टाचार भेंट मानना पर्याप्त नहीं होगा।
इनके पीछे भारत की उस विदेश नीति की झलक दिखाई देती है, जिसमें नई दिल्ली किसी एक शक्ति-गुट के साथ पूरी तरह खड़े होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हित के अनुसार अलग-अलग देशों के साथ अलग-अलग स्तर पर संबंध बनाए रखना चाहती है।
ब्रिक्स के संदर्भ में भारत के सामने बड़ी चुनौती
भारत इस वर्ष ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है।
ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन से हुई थी और बाद में दक्षिण अफ्रीका इसके साथ जुड़ा। समय के साथ इस समूह का विस्तार हुआ और कई अन्य देश भी इससे जुड़े।
ब्रिक्स को केवल एक सामान्य अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।
इसके पीछे दुनिया की बड़ी आबादी, विशाल बाजार, ऊर्जा संसाधन और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थियां हैं। इसलिए आने वाले वर्षों में यह समूह वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है।
यहीं से अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए भी ब्रिक्स का महत्व बढ़ जाता है।
विशेष रूप से तब, जब ब्रिक्स के भीतर डॉलर पर निर्भरता कम करने और आपसी व्यापार के लिए वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था की चर्चा होती रही है।
हालांकि भारत ने ब्रिक्स की साझा मुद्रा के विचार को लेकर अपनी अलग स्थिति स्पष्ट की है। भारत की प्राथमिकता किसी एक मुद्रा व्यवस्था के बजाय अपने राष्ट्रीय हित और आर्थिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना है।
यही भारत की विदेश नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
भारत किसी खेमे का स्थायी हिस्सा बनने के बजाय अपने विकल्प खुले रखना चाहता है।
रूस और चीन के साथ नजदीकी अमेरिका के लिए चिंता क्यों है?
भारत के लिए रूस कोई नया साझेदार नहीं है।
रक्षा, ऊर्जा, परमाणु क्षेत्र और रणनीतिक सहयोग में रूस की भारत के साथ पुरानी भूमिका रही है।
लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के साथ भारत के संबंधों को लेकर पश्चिमी देशों की निगाहें और अधिक तेज हो गईं।
भारत ने रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदा। इसका एक बड़ा कारण आर्थिक था।
रूस से मिलने वाला तेल कई परिस्थितियों में भारत के लिए प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध रहा। इससे भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच कुछ राहत मिली।
लेकिन इस व्यवस्था का दूसरा पहलू भी है।
भारत रूस से जितना अधिक आयात करता है, यदि उसके बदले रूस भारत से पर्याप्त सामान नहीं खरीदता, तो दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन बढ़ता है।
यानी भारत को रूस से व्यापार में एक बड़ी चुनौती केवल तेल की कीमत नहीं, बल्कि व्यापार संतुलन की भी है।
भारत चाहता है कि रूस भारत से भी अधिक सामान खरीदे।
यहीं से अगला सवाल आता है—क्या दोनों देश व्यापार को अधिक संतुलित बना सकते हैं?
रूस से सस्ता तेल, लेकिन डॉलर का सवाल
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर तेल आयात करता है।
इसलिए तेल की कीमत में छोटा बदलाव भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकता है।
यदि भारत को किसी देश से अपेक्षाकृत सस्ता तेल मिलता है, तो उसका सीधा फायदा भारतीय अर्थव्यवस्था को मिल सकता है। इससे ईंधन की कीमतों, महंगाई और उद्योगों की लागत पर भी असर पड़ता है।
रूस से बढ़ा तेल आयात इसी आर्थिक सोच का हिस्सा माना जा सकता है।
लेकिन समस्या यह है कि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और डॉलर की जरूरत का संबंध उसके वैश्विक व्यापार से भी है।
भारत अमेरिका के साथ व्यापार में बड़ा लाभ कमाता है, जबकि रूस और चीन के साथ व्यापार में कई बार भारत का आयात अधिक रहता है।
इसलिए भारत के सामने एक कठिन संतुलन है।
एक तरफ रूस से ऊर्जा सुरक्षा।
दूसरी तरफ अमेरिका के साथ बड़ा व्यापारिक लाभ।
और तीसरी तरफ चीन के साथ विशाल व्यापार, लेकिन बड़ा व्यापार घाटा।
भारत को इन तीनों संबंधों को एक साथ संभालना है।
अमेरिका का दबाव और भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता
अमेरिका चाहता है कि रूस पर आर्थिक दबाव बना रहे।
भारत की स्थिति अलग है।
भारत का तर्क मूल रूप से यह रहा है कि उसकी ऊर्जा जरूरतें और राष्ट्रीय हित किसी दूसरे देश की विदेश नीति के अनुसार तय नहीं हो सकते।
यही कारण है कि भारत रूस से तेल खरीदता रहा है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी रूस पर आर्थिक प्रतिबंधों के माध्यम से दबाव बनाने की कोशिश करते रहे हैं।
यदि अमेरिका भारत पर रूस से व्यापार करने के कारण भारी शुल्क लगाने की धमकी देता है, तो यह केवल व्यापार का मुद्दा नहीं रह जाता।
यह रणनीतिक स्वायत्तता का प्रश्न बन जाता है।
भारत के सामने सवाल होता है—
क्या वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देगा?
क्या वह अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को प्राथमिकता देगा?
या फिर दोनों के बीच ऐसा संतुलन बनाएगा जिसमें किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता न हो?
भारत अब तक तीसरे रास्ते की ओर बढ़ता दिखाई देता है।
भारत किसी एक देश पर निर्भर क्यों नहीं होना चाहता?
विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है—विविधता।
जिस तरह कोई समझदार निवेशक अपना पूरा पैसा एक ही जगह नहीं लगाता, उसी तरह कोई बड़ा देश अपनी ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और तकनीक की पूरी जरूरत केवल एक देश से पूरी नहीं करना चाहता।
भारत की ऊर्जा नीति में भी यही सोच दिखाई देती है।
रूस से तेल खरीदना भारत की रणनीति का एक हिस्सा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत केवल रूस पर निर्भर रहना चाहता है।
भारत खाड़ी देशों, अमेरिका और अन्य ऊर्जा उत्पादक देशों से भी संबंध बनाए रखता है।
इसके पीछे एक सीधा कारण है।
यदि किसी एक देश के साथ राजनीतिक तनाव पैदा हो जाए, तो भारत की पूरी अर्थव्यवस्था उस तनाव की कीमत न चुकाए।
इसी को रणनीतिक विविधता कहा जा सकता है।
अब चीन की तरफ देखिए
भारत-चीन संबंधों की कहानी और भी जटिल है।
दोनों देशों के बीच व्यापार बहुत बड़ा है। लेकिन सीमा विवाद भी लंबे समय से मौजूद है।
विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन की आपत्तियां लगातार सामने आती रही हैं।
भारत का स्पष्ट रुख है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है।
चीन की ओर से इस क्षेत्र पर अलग दावा किया जाता है।
यही कारण है कि भारत और चीन के बीच सीमा से जुड़े प्रश्न केवल नक्शे या जमीन तक सीमित नहीं हैं।
इनका संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और दोनों देशों की दीर्घकालीन रणनीति से है।
डोभाल और वांग यी की मुलाकात क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत और चीन ने सीमा विवाद को बातचीत के माध्यम से सुलझाने के लिए विशेष प्रतिनिधियों की व्यवस्था बनाई है।
इस प्रक्रिया में भारत की ओर से अजीत डोभाल और चीन की ओर से वांग यी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
गलवान घाटी की घटना के बाद भारत-चीन संबंधों में गंभीर तनाव आया था।
इसके बाद दोनों देशों के बीच बातचीत का महत्व और बढ़ गया।
इसलिए डोभाल की चीन यात्रा को केवल एक सामान्य यात्रा के रूप में देखना सही नहीं होगा।
इस तरह की बातचीत का उद्देश्य केवल एक बैठक करना नहीं होता।
इनका उद्देश्य तनाव कम करने के रास्ते तलाशना, सीमा पर स्थिति को स्थिर करना और व्यापक संबंधों के लिए संवाद का रास्ता खुला रखना होता है।
और जब ऐसी मुलाकात उसी समय हो रही हो जब भारत ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है, तब इसका महत्व और बढ़ जाता है।
क्या शी जिनपिंग भारत आएंगे?
स्रोत सामग्री में यह संभावना व्यक्त की गई है कि शी जिनपिंग भारत में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग ले सकते हैं।
यदि ऐसा होता है, तो यह भारत-चीन संबंधों के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम होगा।
लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है।
किसी राष्ट्राध्यक्ष की यात्रा का अर्थ यह नहीं होता कि दोनों देशों के सभी विवाद समाप्त हो गए।
कूटनीति में बातचीत और मतभेद एक साथ चल सकते हैं।
भारत और चीन सीमा पर असहमत हो सकते हैं, लेकिन व्यापार पर बातचीत कर सकते हैं।
वे रणनीतिक प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, लेकिन वैश्विक मंचों पर एक-दूसरे के साथ काम भी कर सकते हैं।
यही आधुनिक कूटनीति की जटिलता है।
भारत-चीन संबंधों में व्यापार सबसे बड़ा आर्थिक सवाल
भारत और चीन के बीच व्यापार बहुत बड़ा है, लेकिन इसमें भारत के लिए व्यापार घाटा एक बड़ी चिंता है।
सरल शब्दों में समझें तो यदि भारत चीन से बहुत ज्यादा सामान खरीदता है और चीन भारत से तुलनात्मक रूप से कम सामान खरीदता है, तो भारत का व्यापार घाटा बढ़ता है।
भारत के लिए चुनौती यह है कि चीन के साथ व्यापार केवल आयात तक सीमित न रहे।
भारत चाहता है कि उसके उत्पादों को भी चीनी बाजार में अधिक जगह मिले।
यानी भारत का लक्ष्य केवल चीन से सामान खरीदना नहीं, बल्कि चीन को भारतीय सामान बेचकर व्यापार संतुलन सुधारना भी है।
यही मुद्दा भविष्य की उच्चस्तरीय बातचीत में महत्वपूर्ण हो सकता है।
रूस के साथ भारत का रिश्ता: दोस्ती भी, हित भी
रूस और भारत के संबंधों को केवल भावनात्मक मित्रता के नजरिए से देखना अधूरा होगा।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मित्रता महत्वपूर्ण होती है, लेकिन राष्ट्रीय हित उससे भी अधिक महत्वपूर्ण होता है।
भारत रूस से ऊर्जा खरीदता है।
रक्षा क्षेत्र में रूस की ऐतिहासिक भूमिका है।
परमाणु ऊर्जा सहित कई रणनीतिक क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग रहा है।
इसलिए भारत के लिए रूस को अचानक छोड़ देना आसान नहीं है।
दूसरी तरफ रूस और चीन के बीच भी नजदीकी बढ़ी है।
भारत नहीं चाहेगा कि रूस और चीन की साझेदारी इतनी गहरी हो जाए कि वह भविष्य में भारत के रणनीतिक हितों के विरुद्ध काम करने लगे।
इसलिए भारत रूस के साथ संबंध बनाए रखते हुए चीन के साथ भी संवाद करता है।
यही वह संतुलन है जिसे समझना जरूरी है।
भारत की विदेश नीति का असली मॉडल क्या है?
भारत की रणनीति को एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है—
भारत किसी एक शक्ति के साथ बंधकर नहीं, बल्कि कई शक्तियों के साथ अपने हित के अनुसार संबंध बनाकर आगे बढ़ना चाहता है।
अमेरिका के साथ व्यापार और तकनीक।
रूस के साथ ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग।
चीन के साथ सीमा और व्यापार पर बातचीत।
खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा और निवेश।
यूरोप के साथ व्यापार और तकनीक।
और ब्रिक्स तथा अन्य बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से विकासशील देशों के साथ सहयोग।
यह बहु-स्तरीय विदेश नीति भारत को अधिक विकल्प देती है।
ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए परीक्षा क्यों है?
भारत के लिए ब्रिक्स सम्मेलन केवल एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम नहीं है।
यह कूटनीतिक क्षमता की परीक्षा भी है।
यदि रूस और चीन के शीर्ष नेतृत्व भारत आते हैं, तो भारत को एक ही मंच पर कई बड़े मुद्दों पर बातचीत का अवसर मिलेगा।
ऊर्जा।
व्यापार।
सीमा।
डॉलर पर निर्भरता।
वैश्विक वित्तीय व्यवस्था।
भूराजनीतिक तनाव।
और विकासशील देशों की भूमिका।
भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर यह होगा कि वह अलग-अलग देशों के बीच अपने संबंधों को एक व्यापक रणनीति में बदल सके।
भारत को इस पूरे खेल में क्या हासिल करना चाहिए?
भारत को केवल यह देखकर खुश नहीं होना चाहिए कि कौन-सा बड़ा नेता भारत आया।
असल सवाल यह है कि उस यात्रा से भारत को क्या मिला?
रूस से भारत को अधिक संतुलित व्यापार चाहिए।
चीन से सीमा पर स्थिरता और व्यापार घाटे को कम करने की दिशा में ठोस प्रगति चाहिए।
अमेरिका के साथ भारत को व्यापार, तकनीक और निवेश के संबंध मजबूत रखने हैं।
और सबसे महत्वपूर्ण—भारत को अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बचाए रखनी है।
किसी एक देश के दबाव में आकर निर्णय लेना भारत के दीर्घकालीन हित में नहीं होगा।
सबसे बड़ा संदेश: भारत अब केवल प्रतिक्रिया नहीं दे रहा
भारत की विदेश नीति में एक बड़ा बदलाव यह दिखाई देता है कि भारत अब केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रहना चाहता।
भारत अपनी शर्तों पर संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है।
जहां फायदा है, वहां अमेरिका के साथ साझेदारी।
जहां ऊर्जा सुरक्षा है, वहां रूस के साथ व्यापार।
जहां सीमा का विवाद है, वहां चीन से बातचीत।
जहां विकासशील देशों का साझा हित है, वहां ब्रिक्स जैसे मंच।
यही बहुध्रुवीय दुनिया में भारत की वास्तविक ताकत बन सकती है।
निष्कर्ष: यह दोस्ती या दुश्मनी का खेल नहीं, हितों का खेल है
रूस, चीन और अमेरिका के बीच भारत की स्थिति को केवल दोस्ती और दुश्मनी के चश्मे से देखना सही नहीं होगा।
आज की वैश्विक राजनीति में स्थायी मित्र और स्थायी शत्रु से ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं—स्थायी राष्ट्रीय हित।
भारत रूस से तेल खरीद सकता है और अमेरिका के साथ व्यापार भी कर सकता है।
भारत चीन के साथ सीमा विवाद पर कड़ा रुख रख सकता है और उसी चीन के साथ व्यापार पर बातचीत भी कर सकता है।
यही विरोधाभास वास्तव में आधुनिक कूटनीति का हिस्सा है।
भारत के सामने चुनौती यह है कि वह इस संतुलन को कितनी कुशलता से बनाए रखता है।
यदि भारत रूस से ऊर्जा सुरक्षा, चीन से सीमा पर स्थिरता, अमेरिका से व्यापार और तकनीक तथा ब्रिक्स से वैश्विक प्रभाव हासिल कर पाया, तो आने वाले वर्षों में भारत की भूमिका और मजबूत हो सकती है।
लेकिन यदि भारत किसी एक शक्ति के दबाव में आ गया, तो उसके विकल्प सीमित हो सकते हैं।
इसलिए आज का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि भारत किसके साथ है?
बड़ा सवाल यह है—
भारत अपने हितों के साथ कितनी मजबूती से खड़ा है?
और शायद यही आने वाले समय में भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा भी होगी।
आप इस पूरे घटनाक्रम को कैसे देखते हैं?
क्या भारत को रूस के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी और मजबूत करनी चाहिए?
क्या चीन के साथ बातचीत बढ़ाना सही कदम है?
और क्या अमेरिका के दबाव के बावजूद भारत को अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए?
अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।